Wednesday, November 7, 2018

बिच्छी झारने का मंत्र

ॐ बिच्छी बिच्छी तरनी जात छोटी बड़ी अठारह जात छः काली छः पीली छः रोवानी बलिहार हार पोर पोर बिच्छी उतरै अँगुरी के पोर नीलकंठ मोही शिव शंकर सत्य सहित बिच्छी झरि परै दोहाई लोना चमईनी की।

जहर जब तक उतर न जाये तब तक झारते रहो

और दीवाली और सूर्य  एवं चंद्र ग्रहण पर जगा ले 7, 11, 108 या 1008 बार पैड कर।

नजर झारने का मंत्र

ॐ कला काली महाकाली मसान काली माया का पिंड नौ दिया नौ बाती टोनही का टोना मारती आपन गुण गावती आदि वाचा छोड़ परमेश्वरी इन्द्र के ताड़े ताँबे की टोकरी रोग दोस भूत को झारो जय कामरु कामाख्या भगवती की दुहाई।

इतना पढ़ने के बाद विभूति मार दो
7 बार या 11 बार फूंक मारने है।

और दीवाली और सूर्य  एवं चंद्र ग्रहण पर जगा ले 7, 11, 108 या 1008 बार पैड कर।

Thursday, September 20, 2018

भाग्यम फलत सर्वदा

भाग्यम फलत सर्वदा न च विद्या न च पौरशः

भाग्य हमेशा फल देता है अगर आपके पास विद्या और पौरुष नही है तो भी।

Sunday, April 1, 2018

कविता जाने क्यूं

*एक अच्छी कविता प्राप्त हुई है, जो मनन योग्य है।*

_"जाने क्यूं_
_अब शर्म से,_
_चेहरे गुलाब नही होते।_
_जाने क्यूं_
_अब मस्त मौला मिजाज नही होते।_

_पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें।_
_जाने क्यूं_
_अब चेहरे_,
_खुली किताब नही होते।_

_सुना है_
_बिन कहे_
_दिल की बात_
_समझ लेते थे।_
_गले लगते ही_
_दोस्त हालात_
_समझ लेते थे।_

_तब ना फेस बुक_
_ना स्मार्ट मोबाइल था_
_ना फेसबुक_
_ना ट्विटर अकाउंट था_
_एक चिट्टी से ही_
_दिलों के जज्बात_
_समझ लेते थे।_

_सोचता हूं_
_हम कहां से कहां आ गये,_
_प्रेक्टीकली सोचते सोचते_
_भावनाओं को खा गये।_

_अब भाई भाई से_
_समस्या का समाधान_
_कहां पूछता है_
_अब बेटा बाप से_
_उलझनों का निदान_
_कहां पूछता है_
_बेटी नही पूछती_
_मां से गृहस्थी के सलीके_
_अब कौन गुरु के_
_चरणों में बैठकर_
_ज्ञान की परिभाषा सीखे।_

_परियों की बातें_
_अब किसे भाती है_
_अपनो की याद_
_अब किसे रुलाती है_
_अब कौन_
_गरीब को सखा बताता है_
_अब कहां_
_कृष्ण सुदामा को गले लगाता है_

_जिन्दगी मे_
_हम प्रेक्टिकल हो गये है_
_मशीन बन गये है सब_
_इंसान जाने कहां खो गये है!

*इंसान जाने कहां खो गये* 🙏🏼🙏🏼

Wednesday, July 19, 2017

कविता - मुक्ति का द्वार

आज मैंने अपनी पहली कविता लिखी है।
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कविता - मुक्ति का द्वार
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प्रभु की कृपा है अपरम्पार
बिनु हरि कृपा न होइहि पार

प्रभु का भजन करे जो कोई
कृपा पात्र तब प्रभु के होइ

जो भी कृपा प्रभु की पइहैं
हाथ पकड़ के पार उतरीहै

जो होना चाहे भव से पार
नित्य भजन करे दिन चार

मानव तन है मुक्ति का द्वार
यह अवसर मिले एक बार

बड़े पुण्ड्या कर्मो से मिलता
जो भी हरि का भजन है करता

बिनु गुरु के कुछ समझ न आवै
हरि के रास्ता कौन दिखावै

जो करता गुरु का गुण गान
हरि भी उसके परमनिधान

ढूंढो गुरु को बारम्बार
अवसर छूटै न इस बार

गुरु में भी हो शक्ति अपार
जो करे तुम्हे दुखो से पार

भवसागर से होइहि पार
छूट न जाये अब की बार

व्यर्थ न हो जीवन इस बार
नही करना चौरसिया पार

दिखावे सीधा हरि का द्वार
एक नही हो एक हजार

प्रभु नही है बाहर द्वार
उनको ढूंढो अंतर द्वार

नाम उसके है अनेक प्रकार
एक नही है एक हजार

वही हमे भव पर उतारे
जब हम जाए उसके द्वारे

बस एक ही है आधार
राम कहो या ओमकार

हो जावो तुम अंतर्धान
मन से गुरु को करो प्रणाम

ॐ जपो या राम जपो
दिन में बारम्बार जपो

पूरी रात रहे लय प्रभु की
तभी मुक्ति होएगी सब की।

पं. अखिलेश्वर दुबे
अछोला मेजा इलाहाबाद
9819935922

Monday, July 25, 2016

भारत का नया गीत


भारत का नया गीत

 

आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,

शैतानी शैतान की।

 नेताओं से बहुत दुखी है,

जनता हिन्दुस्तान की।।

 बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,

घोटालों की थाली में।

 सूटकेश भर के चलते हैं,

अपने यहाँ दलाली में।।

 देश-धर्म की नहीं है चिंता,

चिन्ता निज सन्तान की।

 नेताओं से बहुत दुखी है,

जनता हिन्दुस्तान की।।

 चोर-लुटेरे भी अब देखो,

सांसद और विधायक हैं।

 सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,

सचमुच के खलनायक हैं।।

 भिखमंगों में गिनती कर दी,

भारत देश महान की।

 नेताओं से बहुत दुखी है,

जनता हिन्दुस्तान की।।

 जनता के आवंटित धन को,

आधा मन्त्री खाते हैं।

 बाकी में अफसर-ठेकेदार,

मिलकर मौज उड़ाते हैं।।

 लूट-खसोट मचा रखी है,

सरकारी अनुदान की।

 नेताओं से बहुत दुखी है,

जनता हिन्दुस्तान की।।

 थर्ड क्लास अफसर बन जाता,

फर्स्ट क्लास चपरासी है।

 होशियार बच्चों के मन में,

छायी आज उदासी है।।

 गंवार सारे मंत्री बन गये,

मेधावी आज खलासी है।

 आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,

शैतानी शैतान की।।

 नेताओं से बहुत दुखी है,.

जनता हिन्दुस्तान की।

Tuesday, July 5, 2016

ओक्का बोक्का

ओक्का बोक्का तीन तलोक्का,
फूट गयल बुढ़ऊ क हुक्का।
फगुआ कजरी कहाँ हेरायल,
अब त गांव क गांव चुड़ूक्का।।

नया जमाना नयके लोग,
नया नया कुल फईलल रोग।
एक्के बात समझ में आवै,
जइसन करनी वइसन भोग।।

नई नई कुल फइलल पूजा,
नया नया कुल देबी देवता।
एक्कै घर में पांच ठो चूल्हा,
एक्कै घरे में पांच ठो नेवता।।

नउआ कउआ बार बनउवा,
कवनो घरे न फरसा झऊआ।
लगे पितरपख होय खोजाई,
खोजले मिलें न कुक्कुर कउआ।।

एहर पक्का ओहर पक्का,
जेहर देखा ओहर पक्का।
गांव क माटी महक हेराइल,
अंकल कहा कहा मत कक्का।।

कहाँ गयल कुल बंजर ऊसर,
लगत बा जइसे गांव ई दूसर।
जब से ई धनकुट्टि आइल,
कउनो घरे न ओखरी मूसर।।

कहाँ बैल क घुंघरू घण्टी,
कहाँ बा पुरवट अऊर इनारा।
कहां गइल पनघट क गोरी,
सूना सूना पनघट सारा।।

शहर गांव के घीव खियावै,
दाल शहर से गांव में आवै।
शहरन में महके बिरियानी,
कलुआ खाली धान ओसावै।।

गांव गली में अब त खाली,
राजनीती पर होले चर्चा।
अब ऊ होरहा कहाँ भुजाला,
कहाँ पिसाला नीमक मरचा।।

कबो कबो सोंचीला भाई,
अब ऊ दिन ना लौट के आई।
अब ना वइसे कोयल बोलिहैं,
वइसे ना महकी अमराई।।