1. संचित कर्म (Sanchit Karma)
- यह आपके जन्म-जन्मांतर के सभी कर्मों का संचित भंडार होता है।
- इसमें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म शामिल होते हैं।
- यह एक तरह का "कर्म बैंक" है, जिसमें आपके सभी कर्मों का संग्रह रहता है।
- इस संचित कर्म का केवल एक भाग ही अगले जन्म में फल देने के लिए चुना जाता है।
उदाहरण: मान लीजिए आपने अनेक जन्मों में हजारों कर्म किए हैं। वे सभी मिलकर संचित कर्म कहलाते हैं।
2. प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma)
- संचित कर्म का वह भाग, जिसका फल वर्तमान जन्म में निश्चित रूप से भोगना है, प्रारब्ध कर्म कहलाता है।
- जन्म, परिवार, शारीरिक बनावट, कुछ सुख-दुःख, आयु आदि को सामान्यतः प्रारब्ध का परिणाम माना जाता है।
- इसे बदलना बहुत कठिन माना गया है; इसका फल भोगना पड़ता है।
उदाहरण: किस परिवार में जन्म होगा, कुछ अनिवार्य जीवन परिस्थितियाँ—ये प्रारब्ध के अंतर्गत मानी जाती हैं।
3. क्रियमाण कर्म (Kriyamāṇa Karma) / आगामी कर्म (Agami Karma)
- जो कर्म आप अभी इस समय कर रहे हैं, वे क्रियमाण कर्म हैं।
- यही भविष्य के संचित कर्म बन जाते हैं।
- इन कर्मों पर आपका नियंत्रण होता है, इसलिए वर्तमान में सही कर्म करके भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
उदाहरण: ईमानदारी, दान, सेवा, झूठ बोलना, किसी की सहायता करना—आज जो भी आप करते हैं, वह क्रियमाण कर्म है।
तीनों का संबंध
क्रियमाणकर्म
↓
संचितकर्ममेंजुड़तेहैं
↓
संचितकर्मकाएकभाग
↓
प्रारब्धकर्मबनकरअगलेयावर्तमानजन्ममेंफलदेताहै
सरल उदाहरण
मान लीजिए एक किसान के पास बहुत सारे बीज हैं:
- संचित कर्म = गोदाम में रखे सभी बीज।
- प्रारब्ध कर्म = इस मौसम में बोए गए बीज, जिनकी फसल अब अवश्य मिलेगी।
- क्रियमाण कर्म = आज किसान जो नए बीज खरीद रहा है या बो रहा है, जो भविष्य की फसल तय करेंगे।
सारांश:
- संचित कर्म → सभी जन्मों के कर्मों का संग्रह।
- प्रारब्ध कर्म → संचित कर्म का वह भाग जिसका फल वर्तमान जीवन में मिल रहा है।
- क्रियमाण कर्म → वर्तमान में किए जा रहे कर्म, जो भविष्य का संचित और प्रारब्ध बनेंगे।
यही कर्म सिद्धांत का सबसे प्रचलित और व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने वाला वर्गीकरण है।