विस्मित सभा, अवाक जन
akhileshwar
Thursday, October 29, 2026
अपनी-अपनी अंतर्दृष्टि से अपनी-अपनी अंतर्दृष्टि से देख रहे प्रभु को नर-नारी
Thursday, September 17, 2026
सेवा केवल जल चढ़ाना, पूजा करना या भगवान को सामग्री अर्पित करना नहीं है।
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
सरल अर्थ
- प्रातकाल
उठि
कै
रघुनाथा
— भगवान श्रीराम प्रातःकाल उठते थे।
- मातु पिता गुरु नावहिं माथा — वे माता, पिता और गुरु को सिर झुकाकर प्रणाम करते थे।
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥
सरल अर्थ (हिंदी)
- सोइ सेवक प्रियतम मम सोई — वही सेवक मुझे सबसे प्रिय है।
- मम अनुसासन मानै जोई — जो मेरे आदेश और धर्मसम्मत अनुशासन का पालन करता है।
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥
सरल अर्थ
भगवान
श्रीराम अपने माता-पिता
और गुरु से आज्ञा लेकर
ही नगर के कार्य
या अपने दैनिक कर्तव्य
करते थे। उनके इस
विनम्र, अनुशासित और आदर्श आचरण
को देखकर राजा दशरथ
का
हृदय
अत्यंत
प्रसन्न
हो
जाता
था।
सुनहु बिभीषण प्रभु कै रीती।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
सरल अर्थ
“हे विभीषण! सुनो, प्रभु श्रीराम की रीति ऐसी है कि वे अपने सेवकों से सदा प्रेम करते हैं।”
अर्थात्
जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान श्रीराम की सेवा और भक्ति करता है, श्रीराम उस पर हमेशा प्रेम और कृपा रखते हैं।
भाव: भगवान के लिए व्यक्ति का पद या बड़ा-छोटा होना महत्वपूर्ण नहीं है; सच्ची भक्ति और समर्पण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
Friday, August 28, 2026
कविता: रामधारी सिंह दिनकर
Friday, June 26, 2026
कर्म मुख्य रूप से तीन प्रकार के माने जाते हैं
1. संचित कर्म (Sanchit Karma)
- यह आपके जन्म-जन्मांतर के सभी कर्मों का संचित भंडार होता है।
- इसमें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म शामिल होते हैं।
- यह एक तरह का "कर्म बैंक" है, जिसमें आपके सभी कर्मों का संग्रह रहता है।
- इस संचित कर्म का केवल एक भाग ही अगले जन्म में फल देने के लिए चुना जाता है।
उदाहरण: मान लीजिए आपने अनेक जन्मों में हजारों कर्म किए हैं। वे सभी मिलकर संचित कर्म कहलाते हैं।
2. प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma)
- संचित कर्म का वह भाग, जिसका फल वर्तमान जन्म में निश्चित रूप से भोगना है, प्रारब्ध कर्म कहलाता है।
- जन्म, परिवार, शारीरिक बनावट, कुछ सुख-दुःख, आयु आदि को सामान्यतः प्रारब्ध का परिणाम माना जाता है।
- इसे बदलना बहुत कठिन माना गया है; इसका फल भोगना पड़ता है।
उदाहरण: किस परिवार में जन्म होगा, कुछ अनिवार्य जीवन परिस्थितियाँ—ये प्रारब्ध के अंतर्गत मानी जाती हैं।
3. क्रियमाण कर्म (Kriyamāṇa Karma) / आगामी कर्म (Agami Karma)
- जो कर्म आप अभी इस समय कर रहे हैं, वे क्रियमाण कर्म हैं।
- यही भविष्य के संचित कर्म बन जाते हैं।
- इन कर्मों पर आपका नियंत्रण होता है, इसलिए वर्तमान में सही कर्म करके भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
उदाहरण: ईमानदारी, दान, सेवा, झूठ बोलना, किसी की सहायता करना—आज जो भी आप करते हैं, वह क्रियमाण कर्म है।
तीनों का संबंध
क्रियमाणकर्म
↓
संचितकर्ममेंजुड़तेहैं
↓
संचितकर्मकाएकभाग
↓
प्रारब्धकर्मबनकरअगलेयावर्तमानजन्ममेंफलदेताहै
सरल उदाहरण
मान लीजिए एक किसान के पास बहुत सारे बीज हैं:
- संचित कर्म = गोदाम में रखे सभी बीज।
- प्रारब्ध कर्म = इस मौसम में बोए गए बीज, जिनकी फसल अब अवश्य मिलेगी।
- क्रियमाण कर्म = आज किसान जो नए बीज खरीद रहा है या बो रहा है, जो भविष्य की फसल तय करेंगे।
सारांश:
- संचित कर्म → सभी जन्मों के कर्मों का संग्रह।
- प्रारब्ध कर्म → संचित कर्म का वह भाग जिसका फल वर्तमान जीवन में मिल रहा है।
- क्रियमाण कर्म → वर्तमान में किए जा रहे कर्म, जो भविष्य का संचित और प्रारब्ध बनेंगे।
यही कर्म सिद्धांत का सबसे प्रचलित और व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने वाला वर्गीकरण है।