Sunday, April 5, 2026

प्रवचन के लिए श्लोक

" *सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं* ।
*जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं*॥"
जब कोई जीव (मनुष्य) सच्चे मन से भगवान के सामने (उनकी शरण में) आता है,
तो उसके करोड़ों जन्मों के पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥" 
भगवान राम का नाम चाहे प्रेम से (भाव), बैर/द्वेष से (कुभाव), क्रोध में (अनख) या आलस्य में (आलस) किसी भी तरह जपा जाए, वह दसों दिशाओं में कल्याण (मंगल) ही करता है। यह नाम की सर्वोपरि शक्ति का प्रतीक है।

“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई ।
जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई ॥”

“भगवान को वही समझ सकता है जिसे उनकी कृपा मिले, और जो समझ लेता है वो भगवान जैसा हो जाता है”

“बिनु सतसंग विवेक न होई ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥”
अच्छी संगति से ही समझ आती है, और अच्छी संगति भी भगवान की कृपा से ही मिलती है”

“परहित सरिस धरम नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥”
दूसरों का भला करना सबसे बड़ा धर्म है, और किसी को दुख देना सबसे बड़ा पाप

जहाँ सुमति तहाँ संपति नाना ।
जहाँ कुमति तहाँ विपति निदाना ॥
जहाँ अच्छी सोच होती है, वहाँ सुख-समृद्धि आती है, जहाँ गलत सोच होती है, वहाँ मुसीबत आती है

करम प्रधान विश्व करि राखा ।
जो जस करहि सो तस फल चाखा ॥
जैसा कर्म करोगे, वैसा फल मिलेगा

राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार ॥
अपनी जिह्वा (जीभ) पर राम नाम का दीप जलाओ, इससे अंदर और बाहर दोनों जगह उजाला होगा

होइहि सोइ जो राम रचि राखा ।
को करि तरक बढ़ावै साखा ॥
जो भगवान ने तय किया है वही होगा, ज्यादा चिंता या तर्क करने से कुछ नहीं बदलता


No comments:

Post a Comment