Tuesday, July 19, 2022

कदली सीप भुजंग मुख ,स्वाति एक गुण तीन , जैसी संगति बैठिये ,तैसो ही फल दीन

 कदली सीप भुजंग मुख ,स्वाति एक गुण  तीन ,


जैसी संगति बैठिये ,तैसो ही फल दीन।

भावार्थ :दिक्काल और जीव चेतना जब ये तीनों एकत्र होते हैं तो घटना घटती है। प्रस्तुत नीति परक दोहे में बूँद का गिरना घटना है। स्वाति नक्षत्र काल है। स्वाति नक्षत्र में घटित हुई है घटना। कदली (केला ),सीप और भुजंग तीनों के दिक् (परिवास ,हैबिटैट )अलग अलग है। सीप जल में रहती है केला स्थल पर भुजंग बाम्बी में तीनों की  अपनी चल अचल स्थिति अलग अलग  हैं।

बूँदधारण करने वाले के गुणधर्म लेती है। कदली (कच्चे केले )पे गिर के कपूर बनती है.स्वाति नक्षत्र की बूँद सीप में गिरे तो सच्चा मोती बन जाती है और विषधर (कोबरा )के मुख में गिरने पर विषैला जहर ही बनती है।

संगति और कुसंगति दोनों अपना रंग छोड़तीं हैं। अन्यत्र कहा भी गया है :

एक घड़ी  आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ,

तुलसी संगति साधु  की, काटे कोटि अपराध।

यहां बूँद का विशेष पदार्थों में गिरना दिक् से सम्बंधित है। कहने का भाव यह है दिक् और काल दोनों अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

काल कारक है। प्रत्येक क्रिया काल में ही घटित होती है। क्रिया का कारक काल है। स्वाति नक्षत्र में बूँद का गिरना काल है। ऊपर से नीचे की ओर बूँद का गिरना क्रिया है। "घटना" दोनों का ,"समय" और "स्थान" का जोड़ है।

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एक वृत्तांत लीजिये संत और चोर दोनों मंदिर की ओर जा रहे हैं। संत पूजा अर्चना के लिए चोर चोरी के लिए। चरण क्रिया है। फलार्थ भिन्न  होंगे 

बच्चे  के मुख से निकली बात उसके अपने समय में सहज है वही बात कोई बड़ा कहे तो  विक्षेप बन जाएगी।  

मैं और मोर तोर ,तह माया , जेहि बस कीन्हें ,जीव निकाया

 मैं और मोर तोर ,तह माया ,


जेहि बस कीन्हें ,जीव निकाया। 


ये मैं हूँ। ये मेरा है। ये तू है ये तेरा है ,बस ये ही माया है जिसने पूरे जीव संसार को अपने वश  में कर रखा है। ममत्व और अहंकार उस मार्ग की बाधाएं हैं जो भगवान की ओर जाता हैऔर उस परम तत्व परब्रह्म (स्वयं अपने सच्चिदानंद स्वरूप का )बोध कराता है। 

माया से ही पैदा होता है अहंकार और ममत्व। ममत्व यानी मन का ,मेरा ,ये मेरा  

है का भाव ,माया की  ही संतान है।  

Sunday, January 2, 2022

आशीर्वाद

सुखी रहे संसार जगत में दुखिया रहे न कोय ।
यह है अभिलाषा हम सब की भगवन पूरी होय।।
विद्या बुद्धि तेजबल सबके भीतर होय ।
दूध पूत धन धान्य से वंचित रहे न कोय ।।

Wednesday, December 22, 2021

मन से सोचे हुए कार्य को वाणी से न बताए

मनसा चिन्तितंकार्यं 
      वचसा न प्रकाशयेत्।
अन्यलक्षितकार्यस्य 
      यत: सिद्धिर्न जायते॥

*भावार्थः- मन से सोचे हुए कार्य को वाणी से न बताए एवं अपने लक्ष्य के लिए निरंतर अथक प्रयास करते रहें क्योंकि जिस कार्य पर किसी और की दृष्टि लग जाती है, वह सामान्यतः पूर्ण नहीं होता।*

Wednesday, December 15, 2021

सोलह सुखों के बारे में सुना था तो जानिये क्या हैं वो सोलह सुख

*सोलह सुखों के बारे में सुना था तो जानिये क्या हैं वो सोलह सुख*
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1 *पहला सुख निरोगी काया।*
2 *दूजा सुख घर में हो माया।*
3 *तीजा सुख कुलवंती नारी।*
4 *चौथा सुख सुत आज्ञाकारी।*

5 *पाँचवा सुख सदन हो अपना।*
6 *छट्ठा सुख सिर कोई ऋण ना।*
7 *सातवाँ सुख चले व्यापारा।*
8 *आठवाँ सुख हो सबका प्यारा।*

9 *नौवाँ सुख भाई औ' बहन हो ।*
10 *दसवाँ सुख न बैरी स्वजन हो।*
11 *ग्यारहवाँ मित्र हितैषी सच्चा।*
12 *बारहवाँ सुख पड़ौसी अच्छा।*

13 *तेरहवां सुख उत्तम हो शिक्षा।*
14 *चौदहवाँ सुख सद्गुरु से दीक्षा।*
15 *पंद्रहवाँ सुख हो साधु समागम।*
16 *सोलहवां सुख संतोष बसे मन।*

*16 सोलह सुख ये होते भाविक जन।*
*जो पावैं सोइ धन्य हो जीवन।।*

*हालांकि आज के समय में  ये सभी सुख हर किसी को   मिलना मुश्किल हैं  लेकिन इनमे से जितने भी  सुख मिले उससे खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए.*

*जय  श्री राम*