Friday, May 27, 2016

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*

पानी में गुड डालिए,
बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए,
अच्छे हों हालात!!

धनिया की पत्ती मसल,
बूंद नैन में डार!
दुखती अँखियां ठीक हों,
पल लागे दो-चार!!

ऊर्जा मिलती है बहुत,
पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की,
मिट जाए हर पीर!!

प्रातः काल पानी पिएं,
घूंट-घूंट कर आप!
बस दो-तीन गिलास है,
हर औषधि का बाप!!

ठंडा पानी पियो मत,
करता क्रूर प्रहार!
करे हाजमे का सदा,
ये तो बंटाढार!!

भोजन करें धरती पर,
अल्थी पल्थी मार!
चबा-चबा कर खाइए,
वैद्य न झांकें द्वार!!

प्रातः काल फल रस लो,
दुपहर लस्सी-छांस!
सदा रात में दूध पी,
सभी रोग का नाश!!

दही उडद की दाल सँग,
पपीता दूध के संग!
जो खाएं इक साथ में,
जीवन हो बदरंग!!

प्रातः- दोपहर लीजिये,
जब नियमित आहार!                                                  तीस मिनट की नींद लो,
रोग न आवें द्वार!!

भोजन करके रात में,
घूमें कदम हजार!
डाक्टर, ओझा, वैद्य का ,
लुट जाए व्यापार !!

देश,भेष,मौसम यथा,
हो जैसा परिवेश!
वैसा भोजन कीजिये,
कहते सखा सुरेश!!

इन बातों को मान कर,
जो करता उत्कर्ष!
जीवन में पग-पग मिले,
उस प्राणी को हर्ष!!

घूट-घूट पानी पियो,
रह तनाव से दूर!
एसिडिटी, या मोटापा,
होवें चकनाचूर!!

अर्थराइज या हार्निया,
अपेंडिक्स का त्रास!
पानी पीजै बैठकर,
कभी न आवें पास!!

रक्तचाप बढने लगे,
तब मत सोचो भाय!
सौगंध राम की खाइ के,
तुरत छोड दो चाय!!

सुबह खाइये कुवंर-सा,
दुपहर यथा नरेश!
भोजन लीजै रात में,
जैसे रंक सुरेश!!

देर रात तक जागना,
रोगों का जंजाल!
अपच,आंख के रोग सँग,
तन भी रहे निढाल!!

टूथपेस्ट-ब्रश छोडकर,
हर दिन दोनो जून!
दांत करें मजबूत यदि,
करिएगा दातून!!

हल्दी तुरत लगाइए,
अगर काट ले श्वान!
खतम करे ये जहर को,
कह गए कवि सुजान!!

मिश्री, गुड, खांड,
ये हैं गुण की खान!
पर सफेद शक्कर सखा,
समझो जहर समान!!

चुंबक का उपयोग कर,
ये है दवा सटीक!
हड्डी टूटी हो अगर,
अल्प समय में ठीक!!

दर्द, घाव, फोडा, चुभन,
सूजन, चोट पिराइ!
बीस मिनट चुंबक धरौ,
पिरवा जाइ हेराइ!!

हँसना, रोना, छींकना,
भूख, प्यास या प्यार!
क्रोध, जम्हाई रोकना,
समझो बंटाढार!!

सत्तर रोगों कोे करे,
चूना हमसे दूर!
दूर करे ये बाझपन,
सुस्ती अपच हुजूर!!

यदि सरसों के तेल में,
पग नाखून डुबाय!
खुजली, लाली, जलन सब,
नैनों से गुमि जाय!!

भोजन करके जोहिए,
केवल घंटा डेढ!
पानी इसके बाद पी,
ये औषधि का पेड!!

जो भोजन के साथ ही,
पीता रहता नीर!
रोग एक सौ तीन हों,
फुट जाए तकदीर!!

पानी करके गुनगुना,
मेथी देव भिगाय!
सुबह चबाकर नीर पी,
रक्तचाप सुधराय!!

अलसी, तिल, नारियल,
घी सरसों का तेल!
यही खाइए नहीं तो,
हार्ट समझिए फेल!!

पहला स्थान सेंधा नमक,
पहाड़ी नमक सु जान!
श्वेत नमक है सागरी,
ये है जहर समान!!

तेल वनस्पति खाइके,
चर्बी लियो बढाइ!
घेरा कोलेस्टरॉल तो,
आज रहे चिल्लाइ!!

अल्यूमिन के पात्र का,
करता है जो उपयोग!
आमंत्रित करता सदा ,
वह अडतालीस रोग!!

फल या मीठा खाइके,
तुरत न पीजै नीर!
ये सब छोटी आंत में,
बनते विषधर तीर!!

चोकर खाने से सदा,
बढती तन की शक्ति!
गेहूँ मोटा पीसिए,
दिल में बढे विरक्ति!!

नींबू पानी का सदा,
करता जो उपयोग!
पास नहीं आते कभी,
यकृति-आंत के रोग!!

दूषित पानी जो पिए,
बिगडे उसका पेट!
ऐसे जल को समझिए,
सौ रोगों का गेट!!

रोज मुलहठी चूसिए,
कफ बाहर आ जाय!
बने सुरीला कंठ भी,
सबको लगत सुहाय!!

भोजन करके खाइए,
सौंफ,  गुड, अजवान!
पत्थर भी पच जायगा,
जानै सकल जहान!!

लौकी का रस पीजिए,
चोकर युक्त पिसान!
तुलसी, गुड, सेंधा नमक,
हृदय रोग निदान!!

हृदय रोग, खांसी और
आंव करें बदनाम!
दो अनार खाएं सदा,
बनते बिगडे काम!!

चैत्र माह में नीम की,
पत्ती हर दिन खावे !
ज्वर, डेंगू या मलेरिया,
बारह मील भगावे !!

सौ वर्षों तक वह जिए,
लेत नाक से सांस!
अल्पकाल जीवें, करें,
मुंह से श्वासोच्छ्वास!!

सितम, गर्म जल से कभी,
करिये मत स्नान!
घट जाता है आत्मबल,
नैनन को नुकसान!!

हृदय रोग से आपको,
बचना है श्रीमान!
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक,
का मत करिए पान!!

अगर नहावें गरम जल,
तन-मन हो कमजोर!
नयन ज्योति कमजोर हो,
शक्ति घटे चहुंओर!!

तुलसी का पत्ता करें,
यदि हरदम उपयोग!
मिट जाते हर उम्र में,
तन के सारे रोग!!
        _____......_____

स्वास्थ्य मंत्र

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*

पानी में गुड डालिए,
बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए,
अच्छे हों हालात!!

धनिया की पत्ती मसल,
बूंद नैन में डार!
दुखती अँखियां ठीक हों,
पल लागे दो-चार!!

ऊर्जा मिलती है बहुत,
पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की,
मिट जाए हर पीर!!

प्रातः काल पानी पिएं,
घूंट-घूंट कर आप!
बस दो-तीन गिलास है,
हर औषधि का बाप!!

ठंडा पानी पियो मत,
करता क्रूर प्रहार!
करे हाजमे का सदा,
ये तो बंटाढार!!

भोजन करें धरती पर,
अल्थी पल्थी मार!
चबा-चबा कर खाइए,
वैद्य न झांकें द्वार!!

प्रातः काल फल रस लो,
दुपहर लस्सी-छांस!
सदा रात में दूध पी,
सभी रोग का नाश!!

दही उडद की दाल सँग,
पपीता दूध के संग!
जो खाएं इक साथ में,
जीवन हो बदरंग!!

प्रातः- दोपहर लीजिये,
जब नियमित आहार!                                                  तीस मिनट की नींद लो,
रोग न आवें द्वार!!

भोजन करके रात में,
घूमें कदम हजार!
डाक्टर, ओझा, वैद्य का ,
लुट जाए व्यापार !!

देश,भेष,मौसम यथा,
हो जैसा परिवेश!
वैसा भोजन कीजिये,
कहते सखा सुरेश!!

इन बातों को मान कर,
जो करता उत्कर्ष!
जीवन में पग-पग मिले,
उस प्राणी को हर्ष!!

घूट-घूट पानी पियो,
रह तनाव से दूर!
एसिडिटी, या मोटापा,
होवें चकनाचूर!!

अर्थराइज या हार्निया,
अपेंडिक्स का त्रास!
पानी पीजै बैठकर,
कभी न आवें पास!!

रक्तचाप बढने लगे,
तब मत सोचो भाय!
सौगंध राम की खाइ के,
तुरत छोड दो चाय!!

सुबह खाइये कुवंर-सा,
दुपहर यथा नरेश!
भोजन लीजै रात में,
जैसे रंक सुरेश!!

देर रात तक जागना,
रोगों का जंजाल!
अपच,आंख के रोग सँग,
तन भी रहे निढाल!!

टूथपेस्ट-ब्रश छोडकर,
हर दिन दोनो जून!
दांत करें मजबूत यदि,
करिएगा दातून!!

हल्दी तुरत लगाइए,
अगर काट ले श्वान!
खतम करे ये जहर को,
कह गए कवि सुजान!!

मिश्री, गुड, खांड,
ये हैं गुण की खान!
पर सफेद शक्कर सखा,
समझो जहर समान!!

चुंबक का उपयोग कर,
ये है दवा सटीक!
हड्डी टूटी हो अगर,
अल्प समय में ठीक!!

दर्द, घाव, फोडा, चुभन,
सूजन, चोट पिराइ!
बीस मिनट चुंबक धरौ,
पिरवा जाइ हेराइ!!

हँसना, रोना, छींकना,
भूख, प्यास या प्यार!
क्रोध, जम्हाई रोकना,
समझो बंटाढार!!

सत्तर रोगों कोे करे,
चूना हमसे दूर!
दूर करे ये बाझपन,
सुस्ती अपच हुजूर!!

यदि सरसों के तेल में,
पग नाखून डुबाय!
खुजली, लाली, जलन सब,
नैनों से गुमि जाय!!

भोजन करके जोहिए,
केवल घंटा डेढ!
पानी इसके बाद पी,
ये औषधि का पेड!!

जो भोजन के साथ ही,
पीता रहता नीर!
रोग एक सौ तीन हों,
फुट जाए तकदीर!!

पानी करके गुनगुना,
मेथी देव भिगाय!
सुबह चबाकर नीर पी,
रक्तचाप सुधराय!!

अलसी, तिल, नारियल,
घी सरसों का तेल!
यही खाइए नहीं तो,
हार्ट समझिए फेल!!

पहला स्थान सेंधा नमक,
पहाड़ी नमक सु जान!
श्वेत नमक है सागरी,
ये है जहर समान!!

तेल वनस्पति खाइके,
चर्बी लियो बढाइ!
घेरा कोलेस्टरॉल तो,
आज रहे चिल्लाइ!!

अल्यूमिन के पात्र का,
करता है जो उपयोग!
आमंत्रित करता सदा ,
वह अडतालीस रोग!!

फल या मीठा खाइके,
तुरत न पीजै नीर!
ये सब छोटी आंत में,
बनते विषधर तीर!!

चोकर खाने से सदा,
बढती तन की शक्ति!
गेहूँ मोटा पीसिए,
दिल में बढे विरक्ति!!

नींबू पानी का सदा,
करता जो उपयोग!
पास नहीं आते कभी,
यकृति-आंत के रोग!!

दूषित पानी जो पिए,
बिगडे उसका पेट!
ऐसे जल को समझिए,
सौ रोगों का गेट!!

रोज मुलहठी चूसिए,
कफ बाहर आ जाय!
बने सुरीला कंठ भी,
सबको लगत सुहाय!!

भोजन करके खाइए,
सौंफ,  गुड, अजवान!
पत्थर भी पच जायगा,
जानै सकल जहान!!

लौकी का रस पीजिए,
चोकर युक्त पिसान!
तुलसी, गुड, सेंधा नमक,
हृदय रोग निदान!!

हृदय रोग, खांसी और
आंव करें बदनाम!
दो अनार खाएं सदा,
बनते बिगडे काम!!

चैत्र माह में नीम की,
पत्ती हर दिन खावे !
ज्वर, डेंगू या मलेरिया,
बारह मील भगावे !!

सौ वर्षों तक वह जिए,
लेत नाक से सांस!
अल्पकाल जीवें, करें,
मुंह से श्वासोच्छ्वास!!

सितम, गर्म जल से कभी,
करिये मत स्नान!
घट जाता है आत्मबल,
नैनन को नुकसान!!

हृदय रोग से आपको,
बचना है श्रीमान!
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक,
का मत करिए पान!!

अगर नहावें गरम जल,
तन-मन हो कमजोर!
नयन ज्योति कमजोर हो,
शक्ति घटे चहुंओर!!

तुलसी का पत्ता करें,
यदि हरदम उपयोग!
मिट जाते हर उम्र में,
तन के सारे रोग!!
        _____......_____

Wednesday, April 20, 2016

पुजारी जी की सच्ची भक्ति


एक राजा था, एक बार उसने भगवानकृष्ण जी का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी जी को लगा दिया.पुजारी जी बड़े भाव से बिहारी जी की सेवा करने लगे,

भगवान का श्रंगार करते, भोग लगाते, उन्हें सुलाते,ऐसा करते-करते पुजारी जी बूंढे हो गए,

राजा रोज एक फूलो की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था,

पुजारी जी वह माला बिहारी जी को पहना देते थे,

जब राजा दर्शन करने जाते थे तो पुजारी जी वह माला बिहारी जी के गले से उतार कर राजा को पहना देते थे.ये हर दिन का नियम था.

एक दिन राजा किसी काम से मंदिर नहीं जा सके इसलिए उसने सेवक से कहा-तुम ये माला लेकर मंदिर जाओ और पुजारी जी से कहना आज हमें कुछ काम है इसलिए हम नही सकते वे हमारा इंतजार करे.सेवक ने जाकर माला पुजारी जी को दे दी और सारी बात बता कर वापस गया .पुजारी जी ने माला बिहारी जी को पहना दी फ़िर वे सोचने लगे की आज बिहारीजी की मुझ पर बड़ी कृपा है.राजा तो आज आये नहीं क्यों ये माला में पहन लू ,

इतना सोचकर पुजारी जी ने माला उतार कर स्वंय पहन ली .

इतने में सेवक ने बाहर से कहा-राजा रहे है.

पुजारे जी ने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गलेमें देखली, तो मुझ पर बहुत नाराज होगे हड़बडा़हट में पुजारी जी ने अपने गले से माला उत्तार कर बिहारी जी को पहना दी,जैसे ही राजा आये तो माला उतार कर राजा को पहना दी.

 

राजा ने देखा माला में एक सफ़ेद बाल लगा है तो राजा समझ गए की पुजारी जी ने माला स्वंय पहन ली हैराजा को बहुत गुस्सा आया.

राजा ने पुजारी जी से पूँछा -पुजारी जी ये सफ़ेद बाल किसका है ?

पुजारी जी को लगा अगर में सच बोलूगा तो राजा सजा देगा इसलिये पुजारी जी ने कहा-

ये सफ़ेद बाल बिहारी जी का है.अब तो राजा को और भी गुस्सा आया कि ये पुजारी जी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है.बिहारीजी के बाल भी कही सफ़ेद होते है.

राजा ने कहा - पुजारी जी अगर ये सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह श्रंगार करते, समय में आँउगा और देखूँगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या काले, अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फाँसी की सजा दी जायेगे.

 

इतना कह कर राजा चला गया .अब पुजारी जी रोने लगे और बिहारी जी से कहने लगे

हेप्रभु अब आप ही बचाइए नहीं तो राजा मुझे सुबह होते ही फाँसी पर चढा देगा,

पुजारी जी की सारी रात रोने मेंनिकल गयी कब सुबह हो गयी उन्हें पता ही नहीं चला.

सुबह होते ही राजा गया और बोला पुजारी जी में स्वंय देखूगा.

इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो क्या देखता है बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद है.

 

राजा को लगा, पुजारी जी ने ऐसा किया है अब तो उसे और भी गुस्सा आया और उसने परीक्षा करने के लिए कि बाल असली है या नकली,जैसे ही एक बाल तोडा़ तो बिहारी जी के सिर से खून कि धार बहने लगी और बिहारी जी के श्री विग्रह से आवाज आई कि-

हे राजा तुमने आज तक मुझ केवल एक मूर्ति ही समझा इसलिए आज से में तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ...पुजारी जी तो मुझे साक्षात भगवान् ही समझते हैं !!! ये उनकी श्रद्धा ही है की मेरे बाल मुझे सफेद करने पढ़े व् रक्त की धार भी बहानी पढ़ी तुझे समझाने के लिए !!

और पुजारी जी की सच्ची भक्ति से भगवान बड़े प्रसन्न हुए.

 

सार-- मंदिर में बैठे भगवान केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं है, उन्हें इसी भाव से देखो की वे साक्षात बिहारी जी है और वैसे ही उनकी सेवा करो.

Wednesday, April 13, 2016

कर्म की ऐसी गति है कि देर-सबेर कर्म का फल भोगना ही पड़ता है..


कर्म की ऐसी गति है कि देर-सबेर कर्म का फल भोगना ही पड़ता है..

सदना तीर्थ यात्रा को निकला था

पहले के जमाने में होटेल आदि तो नही था इसलिये लोग रुक जाया करते थे किसी के घर में अतिथि बनकर रात गुजारने के लिएसदना भी किसी घर का अतिथि बना..

उस घर में पति अधेड़ उमर का, पत्नी युवती थी.. मध्यरात्रि को सदना को जगाया, बोली, ‘हम ने तुझे इस लिए ठहराया कि, ये आदमी बूढ़ा है, मेरे किसी काम का नहीं आओ हमसे प्रेम वार्तालाप करो आदि अनर्गल बातें करने लगी.....

सदना बोले, ‘बहनजी यह क्या कहती हो! मुझे जगन्नाथ जी के दर्शन लेना है…’

बोली, ‘साथ मे चलेंगे..भक्त-भक्तानी बनकर

सदना बोले, ‘नही, मेरा विवेक मना करता है..’

बोली, ‘मैं समझ गयी, अभी तेरा डर मिटा देती हूँ

वो गयी और सोते हुए पति की उसी की तलवार से गर्दन काट कर सदना को लाकर दिखाया..

लो! अब डर ख़त्म! चलो इसको गाड़ कर हम भक्त-भक्तानी बन कर जगन्नाथ जी के दर्शन करेंगे..’

चल री ठगनी, मचल मचल के मुझे ना ठग, तेरे हाथ कबीरा ना आवे

ऐसा कबीर जी के यहाँ नाचनेवाली वेश्या आई तो ऐसा कबीर जी ने कहा था, ऐसे ही सदना उस कुलटा के कहने में नहीं आए तो स्त्री को काम सताए तो स्री का क्रोध क्या कर देता देखो..

उस कुलटा ने अपने वस्त्र फाड़ दिये और ज़ोर से चिल्लाई.. ‘बचाओ! ये हमारी इज़्ज़त लूट रहामेरे आदमी का गला काट दिया..’

लोगों ने पकड़ा, राजा के पास ले गये.. राजा ने आदेश दिया ऐसा भक्त के रूप में दैत्य हमारे जेल में भी नही रहेगा.. इस का हाथ काट कर राज्य की सीमा के बाहर जंगल में जगन्नाथ जी के रास्ते पर डाल दो

रोते रोते सदना जगन्नाथ जी की यात्रा करते रहे.. बोलते भगवान, मैने तो कोई कुकर्म नहीं किया, फिर भी ये सज़ा …. तो कौन मानेगा धर्म को?कौन पूजेगा तुम को?

भगवान को पुकारता.. फिर भी चलते जातापैरो मे कांटे चुभते, हाथ कटे हैं.. पैर साफ नहीं कर सकता..जब थक गया तो बोला, ‘हे प्रभु अब इतनी दया करो कि तेरा दर्शन करूं!’

सच्चे दिल से भगवान याद आए तो प्रार्थना करते करते चुप हो गये तो एक घटना घटती है….

राजा रुद्र-प्रताप उड़ीसा के राजा थे.. उनको स्वप्न आया और उनको जगन्नाथ भगवान ने वह जगह बतलाई और कहा कि मेरे उस भक्त को दर्शन करवाओ। जगकर देखा तो स्वप्न को सच पाया। तब तुरंत राजा ने आदेश दिया कि हाथ कटे हुआ यात्री रहा है, उसको जगन्नाथ भगवान का दर्शन कराओ... विशेष अतिथि का दर्जा मिल गया सदना को

सदना बोले, ‘हे जगन्नाथ इतनी दया की! निर्दोष होते हुए भी हाथ कटे तब कहाँ गये थे? ऐसा करते करते वो भाव में गये..

सदना का वहाँ ही ध्यान लग गया ..तो क्या देखा किपिछले जन्म में सदना साधु था, झोपड़ी के बाहर बैठा था, साधना कर रहा था।

..दुबली पतली गाय को देख लिया.. गाय की हत्या

करने कसाई पीछे पड़ा था उसको भी देखा.. गाय सामने से गुजरी, कुछ ही क्षण के बाद कसाई आया..उस ने दूर से आवाज दी, ‘हे महाराज! उस गाय को पकड़ोगाय सामने से गुजर रही थी, साधु दौड़ा और दोनों हाथों से उस गाय को रोक लिया। कसाई ने उसको मार डाला

 "वही गाय सुंदरी और कसाई उस का पति बना इस जन्म में ,

जैसे गाय की गर्दन कसाई ने काटी ऐसे ही उसी स्त्री ने पति

की गर्दन काटी..

एक हाथ ले, एक हाथ देयह नियम है.. अपने हाथों से जंजीर बना कर रोका था गौ को, इसलिए तुम्हारे हाथ कटेइस में मैं क्या करूं?" 

भगवान ने सदना के आगे पूरी कहानी रख दी..

"कर्म के फल भोगने के लिए ही जीव जन्मता मरता है..

सुख देकर सुख भोगता और दुख देकर दुख भोगता है..

मेरे दर्शन करने आते यदि मंदिरो में तो इस वास्तविकता के दर्शन कहाँ होते? कुछ क्षण विग्रह के ही दर्शन होते!

आर्त भाव से प्रार्थना की तो सदना तुम्हारे लिये लिए डोली भेज दी…"

सदना की ध्यान से आँख खुली..

बोले, ‘आप धन्य हैं प्रभु जगन्नाथ

तेरे दर पर तो देर भी नही और अंधेर भी नही

जय हो जगन्नाथ प्रभु ! माझ्या विठ्ठला... पांडुरंगा…' कटे हुए हाथों से भगवान की जय जयकार करने लगा सदनातो कहा जाता हे कि सदना के दोनों कटे हुए हाथ भी पुनः उभर आए! फिर तो उसने मंदिर पहुंच कर जी भर के दर्शन किया..

ईश्वर का संविधान अकाट्य है, झुठला नही सकते.. पाप कट जाएंगे तो भी पुण्य का फल सुख समृद्धि बनेगा.. लेकिन पाप किया हो तो उसका भी कुछ ना कुछ फल तो भोगना ही पड़ेगा..

"अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभाशुभं"

दुख का प्रभाव कम हो जाएगा, या दुख की चोट कम होगी लेकिन पाप कर्मों के कारण पूरा दुख नष्ट नहीं होगा, कुछ तो भोगना ही होगा

जैसे 100 आम के पेड़ लगाए, लेकिन पड़ोस के लोगों को काँटे चुभें इसलिए 50 पेड़ बबूल के लगाए तो आम देने का सुख और कांटे बोने का दुख दोनों भोगने पड़ते हैं, ऐसा नहीं हो सकता की भगवान हम को 100 पेड़ आम के सुख से 50 बबूल के कांटे बोने के दुख माइनस कर दो ..

भगवान बोलेंगे, ‘ नहीं कांटों का फल और आम का फल दोनों लो! ये कर्मफल है।

इसलिए कोई दुष्ट कर्म करो..

पापी को उसका फल मिलता जरूर है..

सुख का लालच हुआ तोहे नाथ!

हे प्रभु!बचाओकह करके पुकारो

कहो दूसरे के साथ गलत कर्म करने से बचाओ प्रभु

प्रभु मैं तेरा हूँ,तुम मेरे हो

अशुभ बोलने से और अशुभ कर्म करने से मुझे बचाओ..

अदर्शनीय देखने से मुझे बचाओ..

हे नाथ अभक्ष्य खाने से बचाओ… 

तब वो अनाथों के नाथ आप को जरूर विवेक देंगे..दयालु भगवान अच्छे लोगों का साथ यानि सत्संग देंगे..