Saturday, January 18, 2025

अक्ल बाँटने लगे विधाता,लम्बी लगी कतारी ।

अक्ल बाँटने लगे विधाता,
लम्बी लगी कतारी ।
सभी आदमी खड़े हुए थे,
कहीं नहीं थी नारी ।।

सभी नारियाँ कहाँ रह गयीं,
था ये अचरज भारी ।
पता चला ब्यूटी पार्लर में,
पहुँच गयीं थीं सारी ।।

मेकअप की थी गहन प्रक्रिया,
एक एक पर भारी ।
बैठी थीं कुछ इन्तजार में,
कब आयेगी बारी ।।

उधर विधाता ने पुरूषों में,
अक्ल बाँट दी सारी ।
पार्लर से फुर्सत पा कर के,
जब पहुँची सब नारी ।।

बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है,
नहीं अक्ल अब बाकी ।
रोने लगी सभी महिलाएँ,
नीन्द खुली ब्रह्मा की ।।

पूछा कैसा शोर हो रहा,
ब्रह्मलोक के द्वारे ?
पता चला कि स्टॉक अक्ल का
पुरुष ले गये सारे ।।

ब्रह्मा जी ने कहा देवियों,
बहुत देर कर दी है ।
जितनी भी थी अक्ल सभी वो,
पुरुषों में भर दी है ।।

लगी चीखने महिलाएँ,
ये कैसा न्याय तुम्हारा ?
कुछ भी करो, चाहिए हमको
आधा भाग हमारा ।।

पुरुषों में शारीरिक बल है,
हम ठहरी अबलाएँ ।
अक्ल हमारे लिए जरुरी,
निज रक्षा कर पाएँ ।।

बहुत सोच दाढ़ी सहला कर,
तब बोले ब्रह्मा जी ।
इक वरदान तुम्हे देता हूँ,
हो जाओ अब राजी ।।

थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी,
रहे पुरुष पर भारी ।
कितना भी वह अक्लमन्द हो,
अक्ल जायेगी मारी ।।

एक बोली, क्या नहीं जानते !
स्त्री कैसी होती है ?
हँसने से ज्यादा महिलाएँ,
बिना बात रोती हैं ।।

ब्रह्मा बोले यही कार्य तब,
रोना भी कर देगा ।
औरत का रोना भी नर की,
बुद्धि को हर लेगा ।।

इक बोली, हमको ना रोना,
ना हँसना आता है ।
झगड़े में हैं सिद्धहस्त हम,
झगड़ा ही भाता है ।।

ब्रह्मा बोले चलो मान ली,
यह भी बात तुम्हारी ।
घर में जब भी झगड़ा होगा,
होगी विजय तुम्हारी ।।

जग में अपनी पत्नी से जब
कोई पति लड़ेगा ।
पछतायेगा, सिर ठोकेगा
आखिर वही झुकेगा ।।

ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से,
अन्तिम वचन हमारा ।
तीन शस्त्र अब तुम्हें दे दिये,
पूरा न्याय हमारा ।।

इन अचूक शस्त्रों में भी,
जो मानव नहीं फँसेगा ।
बड़ा विलक्षण जगतजयी
ऐसा नर दुर्लभ होगा ।।

कहे कवि सब बड़े ध्यान से,
सुन लो बात हमारी ।
बिना अक्ल के भी होती है,
नर पर भारी नारी ।।

Saturday, November 9, 2024

भरा सत्संग का दरिया, नहालो जिसका जी चाहे ।।

 भरा सत्संग का दरिया, नहालो जिसका जी चाहे ।।


दोहा – एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनिआध, तुलसी सत्संग साध कि, कटे करोड़ अपराध।


भरा सत्संग का दरिया, नहालो जिसका जी चाहे।।


द्वारका काशी जावोगे,


द्वारका काशी जावोगे, गया प्रयाग न्हावोगे, नहीं वहाँ मोक्ष पावोगे, फिर आना जिसका जी चाहे, भरा सत्संग का दरियाँ, नहालो जिसका जी चाहे ।।


तीर्थ कहूं ऐसा नहीं होवै, पुराण और ग्रंथों में गावे, अगर्च निश्चय नहिं होवे, बचाना जिसका जी चाहे, भरा सत्संग का दरियाँ, नहालो जिसका जी चाहे ।।


समागम सन्तों का होवे, पाप जन्मांत्र का खोवे, जिगर दिल दाग सब धोवे, धुपाना जिसका जी चाहे, भरा सत्संग का दरियाँ, नहालो जिसका जी चाहे ।।


भारती कल्याण यों गावे, सदा सत्संग मन भावे, सत्संग से मोक्ष पद पावे, कराना जिसका जी चाहे, भरा सत्संग का दरियाँ, नहालो जिसका जी चाहे ।।


भरा सत्संग का दरियाँ, नहालो जिसका जी चाहे ।।

Wednesday, July 17, 2024

झगड़ों से परिवार टूट जाते हैं। गलत शब्द के प्रयोग करने से मित्रता टूट जाती है।

कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहृदं,
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणां ॥

*भावार्थ:- झगड़ों से परिवार टूट जाते हैं। गलत शब्द के प्रयोग करने से मित्रता टूट जाती है। बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है । बुरे काम करने से यश दूर भागता है।*

Thursday, June 20, 2024

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

 सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे,

तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: ॥
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
हे नाथ नारायण...॥
पितु मात स्वामी, सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
हे नाथ नारायण...॥
॥ श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी...॥

बंदी गृह के, तुम अवतारी
कही जन्मे, कही पले मुरारी
किसी के जाये, किसी के कहाये
है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥
है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥
गोकुल में चमके, मथुरा के तारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी, सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

अधर पे बंशी, ह्रदय में राधे
बट गए दोनों में, आधे आधे
हे राधा नागर, हे भक्त वत्सल
सदैव भक्तों के, काम साधे ॥
सदैव भक्तों के, काम साधे ॥
वही गए वही, गए वही गए
जहाँ गए पुकारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

गीता में उपदेश सुनाया
धर्म युद्ध को धर्म बताया
कर्म तू कर मत रख फल की इच्छा
यह सन्देश तुम्ही से पाया
अमर है गीता के बोल सारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बंधू सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देवा
॥ श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी...॥

राधे कृष्णा राधे कृष्णा
राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥
राधे कृष्णा राधे कृष्णा
राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥

हरी बोल, हरी बोल,
हरी बोल, हरी बोल ॥

राधे कृष्णा राधे कृष्णा
राधे राधे कृष्णा कृष्णा
राधे कृष्णा राधे कृष्णा
राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥

Sunday, June 2, 2024

भजन - अधुरं मधुरं वदनं मधुरं

अधुरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुर: पाणिर्मधुर: पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं संख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥


गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतिरखिलं मधुरम् ॥


गोपा मधुरा गावो मथुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मथुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतिरखिलं मधुरम् ॥

Saturday, May 18, 2024

काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।

चौपाईः-काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।
योग-वियोग भोग भल मन्दा। हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा।।
जन्म मरण यहाँ लगि जग जालू। सम्पत्ति विपति कर्म अरु कालू।।
धरणि धाम धन पुर परिवारु। स्वर्ग नरक जहाँ लग व्यवहारु।।
देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं। माया कृत परमार्थ नाहीं।।
दोहाः-सपने होय भिखारि नृप, रंक नाकपति होय।
      जागे लाभ न हानि कछु, तिमि प्रपंच जग जोय।।
अर्थः-लक्ष्मण जी मीठी,कोमल,ज्ञान वैराग्य तथा भक्ति से भरपूर वाणी से बोले-ऐ निषादराज! संसार में न कोई किसी को सुख पहुँचा सकता है, न दुःख। हे भाई! सुख दुःख जीव को अपने कर्मों के अनुसार मिलते हैं। योग अर्थात् मिलाप वियोग अर्थात् बिछोड़ा। भले तथा बुरे कर्मों का भोगना, मित्र-शत्रु तथा मध्यम अर्थात् निष्पक्ष आदि सब भ्रम का जाल है। इसके अतिरिक्त जन्म-मरण, जहां तक इस संसार का पसारा है-सम्पत्ति-विपत्ति-कर्म और काल-पृथ्वी घर-नगर-कुटम्ब,स्वर्ग व नरक एवं जो कुछ भी संसार में देखने सुनने और विचारने में आता है, यह सब माया का पसारा है। इसमें परमार्थ नाम मात्र भी नहीं है। जैसे सपने में राजा भिखारी होवे और कंगाल इन्द्र हो जावे परन्तु जागने पर लाभ या हानि कुछ नहीं-वैसे ही जगत् का प्रपंच स्वप्न के समान मिथ्या है। जागने पर पता लगता है कि न कोई लाभ हुआ है और न कोई हानि हुई है। यह तो सब माया का खेल था, यथार्थ कुछ भी नहीं था।

Saturday, May 11, 2024

अच्छी थी, पगडंडी अपनी। सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।

 अच्छी थी, पगडंडी अपनी।

सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।


फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।

सबके पास, काम बहुत है।।


नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।

हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।

  

उजड़ गए, सब बाग बगीचे।

दो गमलों में, शान बहुत है।।


मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।

कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।।


पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।

कहते हैं, आराम बहुत है।।


बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।

फोनों पर, पैगाम बहुत है।।


आदी हैं, ए.सी. के इतने।

कहते बाहर, घाम बहुत है।।


झुके-झुके, स्कूली बच्चे।

बस्तों में, सामान बहुत है।।


सुविधाओं का, ढेर लगा है।

पर इंसान, परेशान बहुत है।।