Friday, August 28, 2026

कविता: रामधारी सिंह दिनकर

नित जीवन के संघर्षों सेनित जीवन के संघर्षों से, जब टूट चुका हो अंतर्मन,

तब सुख के मिले समंदर का, रह जाता कोई अर्थ नहीं।

जब फसल सूख कर जल के बिन, तिनका-तिनका बन गिर जाये,

फिर होने वाली वर्षा का, रह जाता कोई अर्थ नहीं।

संबध कोई भी हों लेकिन, यदि दुःख में साथ न दें अपना,फिर सुख में उन संबंधों का, रह जाता कोई अर्थ नहीं।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण, निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,

फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का, रह जाता कोई अर्थ नहीं।