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" *सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं* ।
*जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं*॥"
🙏 *अर्थ (सरल हिंदी में* ):
जब कोई जीव (मनुष्य) सच्चे मन से भगवान के सामने (उनकी शरण में) आता है,
तो उसके करोड़ों जन्मों के पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
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भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥"
(श्रीरामचरितमानस) का अर्थ है कि भगवान राम का नाम चाहे प्रेम से (भाव), बैर/द्वेष से (कुभाव), क्रोध में (अनख) या आलस्य में (आलस) किसी भी तरह जपा जाए, वह दसों दिशाओं में कल्याण (मंगल) ही करता है। यह नाम की सर्वोपरि शक्ति का प्रतीक है।